जिले में दर्जनों कंप्यूटर दुकानें, फिर भी चुनिंदा फर्मों पर सरकारी विभागों की निर्भरता पर सवाल
सूरजपुर। डिजिटल युग में जिला मुख्यालय सहित जिले के तमाम शासकीय विभागों और कार्यालयों का कामकाज कंप्यूटर और प्रिंटर के बिना लगभग असंभव हो गया है, लेकिन इन्हीं कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रिपेयरिंग एवं तकनीकी सामग्री की खरीदी को लेकर सरकारी खर्च पर सवाल उठने लगे हैं।
आरोप है कि जिले के कई सरकारी कार्यालयों में छोटे-मोटे तकनीकी कार्यों से लेकर बड़े रिपेयरिंग कार्यों तक के लिए चुनिंदा कंप्यूटर दुकानों पर ही निर्भरता बनी हुई है और सामान्य बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध सामग्री अथवा मामूली तकनीकी कार्यों के लिए कई गुना अधिक राशि के बिल लगाए जा रहे हैं।
सूरजपुर में कंप्यूटर रिपेयरिंग और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री उपलब्ध कराने वाली कई दुकानें होने के बावजूद यदि सरकारी विभाग लगातार एक ही शॉप से ही काम करा रहे हैं तो इसकी चयन प्रक्रिया, दर निर्धारण और भुगतान सत्यापन पर सवाल उठना लाजिमी है।
सरकारी कार्यालयों में प्रिंटर का कार्ट्रिज खत्म होना, सॉफ्टवेयर अपडेट अथवा करप्ट होना, कंप्यूटर की तकनीकी खराबी, हार्ड डिस्क बदलना और सिस्टम की स्पीड बढ़ाने के लिए SSD लगाने जैसे काम नियमित रूप से होते हैं, लेकिन आरोप है कि इन सामान्य कार्यों को भी कई बार महंगे रिपेयरिंग बिल में तब्दील कर दिया जाता है। स्थिति यह बताई जा रही है कि जिस रकम में बाजार से नया कंप्यूटर सिस्टम खरीदा जा सकता है, उतनी राशि तक रिपेयरिंग के बिल सामने आ जाते हैं।
इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या संबंधित विभागों द्वारा रिपेयरिंग से पहले बाजार दरों का तुलनात्मक परीक्षण किया जाता है या प्रस्तुत बिल के आधार पर ही भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी जाती है। स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि सरकारी बिलों में कथित कमीशन का खेल चलता है और वास्तविक लागत तथा भुगतान राशि के बीच का अंतर कहीं और जाता है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और किसी अधिकारी या फर्म को दस्तावेजी जांच के बिना दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि किसी कार्य का वास्तविक बाजार मूल्य कुछ सौ या कुछ हजार रुपये है और उसके बदले कई गुना अधिक राशि का भुगतान किया गया है तो यह सरकारी धन के उपयोग से जुड़ा गंभीर विषय है। ऐसे में जिला प्रशासन को चाहिए कि वह जिले के सभी विभागों में पिछले वर्षों के कंप्यूटर, प्रिंटर, कार्ट्रिज, SSD, हार्ड डिस्क, सॉफ्टवेयर और अन्य आईटी सामग्री की खरीदी तथा रिपेयरिंग पर हुए खर्च का विभागवार परीक्षण कराए और संबंधित नस्तियों से यह पता लगाए कि किस फर्म को कब, कितना और किस कार्य के लिए भुगतान किया गया। बिल के साथ प्रस्तुत कोटेशन, तुलनात्मक दर पत्रक, वर्क ऑर्डर, स्टॉक एंट्री, रिपेयरिंग रिपोर्ट, बदले गए पार्ट्स का विवरण, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र और भुगतान स्वीकृति की भी जांच होनी चाहिए। यदि जांच में बाजार दर से अधिक भुगतान, बिना कार्य के भुगतान, फर्जी या संदिग्ध बिल अथवा किसी अधिकारी-कर्मचारी और फर्म की मिली भगत सामने आती है तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं यदि सभी भुगतान नियमों के अनुरूप पाए जाते हैं तो सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सूरजपुर में कंप्यूटर रिपेयरिंग के लिए दर्जनों दुकानें मौजूद हैं, तो सरकारी कार्यालयों का काम चुनिंदा दुकान तक ही क्यों सीमित है और कंप्यूटर रिपेयरिंग के नाम पर सरकारी खजाने से वास्तव में कितना खर्च हो रहा है।