सीसीटीवी के बावजूद घोटाला: धान गायब, जिम्मेदार गायब, सिस्टम मौन

Cp Sahu 

सूरजपुर। प्रेमनगर थाना क्षेत्र के उमेश्वरपुर धान उपार्जन केंद्र में सामने आए 1 करोड़ 80 लाख रुपये से अधिक के घोटाले ने अब नया और अधिक गंभीर मोड़ ले लिया है। जांच में केवल धान और बारदाने की कमी ही नहीं, बल्कि फर्जी किसानों के नाम पर करोड़ों रुपये के भुगतान की आशंका भी उभरकर सामने आई है। इसके बावजूद कार्रवाई सिर्फ एक सहायक समिति प्रबंधक तक सीमित कर दी गई है।

9 जनवरी 2026 को सहकारिता और विपणन विभाग की संयुक्त टीम द्वारा किए गए औचक निरीक्षण में 7036 क्विंटल धान कम पाया गया। इसकी कीमत लगभग 1.66 करोड़ रुपये आंकी गई, जबकि 17,591 बारदाने भी गायब मिले, जिनकी कीमत करीब 14 लाख रुपये है। कुल गबन की राशि 1,80,68,345 रुपये से अधिक है।

लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल बैंकिंग लेन-देन को लेकर उठ रहा है। सूत्रों के अनुसार, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित शाखा प्रेमनगर के माध्यम से जिन किसानों के खातों में भुगतान दर्शाया गया है, उनमें कई नाम संदिग्ध हैं। प्राथमिक स्तर पर यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ भुगतान ऐसे “फर्जी किसानों” के नाम पर किए गए, जिनका वास्तविक अस्तित्व या तो संदिग्ध है या जिनकी उपज वास्तविक खरीदी से मेल नहीं खाती।

यानी मामला केवल धान गायब होने तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे भुगतान सिस्टम में हेरफेर का संकेत दे रहा है

इस पूरे लेन-देन में बैंक, समिति और खरीदी केंद्र के बीच समन्वय जरूरी होता है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि करोड़ों रुपये का भुगतान बिना किसी उच्चस्तरीय मिलीभगत के हो गया। इसके बावजूद पुलिस ने केवल सहायक समिति प्रबंधक ठाकुर सिंह मरावी को आरोपी बनाकर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(5) और 318(4) के तहत मामला दर्ज किया है और चालान भी पेश कर दिया है।


अब सवाल यह है कि:

किन-किन किसानों के नाम पर भुगतान हुआ ? उनमें से कितने वास्तविक और कितने फर्जी हैं ? बैंक ने भुगतान से पहले सत्यापन की प्रक्रिया कैसे पूरी की? क्या बिना मिलीभगत के इतनी बड़ी राशि का फर्जी भुगतान संभव है?

इन सवालों के जवाब अब तक न तो पुलिस दे पाई है, न ही प्रशासन।

हमर उत्थान सेवा समिति ने इस मामले में कड़ी आपत्ति दर्ज करते हुए स्पष्ट कहा है कि यह घोटाला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की मिलीभगत का परिणाम है। समिति ने मांग की है कि सभी संदिग्ध खातों और भुगतान का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाई जाए।

सीसीटीवी निगरानी, बहुस्तरीय सत्यापन और बैंकिंग प्रक्रिया के बावजूद अगर फर्जी किसानों के नाम पर करोड़ों रुपये का भुगतान हुआ है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार का संकेत है।

अगर अब भी जांच का दायरा नहीं बढ़ाया गया, तो यह मामला भी “एक आरोपी बाकी सुरक्षित” वाली फाइल बनकर रह जाएगा।