उत्थान सेवा समिति ने धान खरीदी घोटाले को संगठित आर्थिक अपराध बताया

समिति का सवाल: जब कई केंद्रों पर कमी मिली, तो FIR सिर्फ एक पर क्यों, तहसील, एसडीएम, सहकारिता और खाद्य विभाग के अफसरों पर भी अपराध दर्ज हो 


सूरजपुर। जिले में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की हकीकत अब पूरी तरह सामने आ चुकी है। यह मामला न साधारण लापरवाही का है, न किसी एक समिति की गलती का यह प्रशासनिक संरक्षण में पनपा संगठित आर्थिक अपराध प्रतीत हो रहा है। जिला प्रशासन की औचक भौतिक जांच में करोड़ों रुपये का धान और वारदाना गायब मिलने के बावजूद कार्रवाई को एक ही केंद्र और एक ही व्यक्ति तक सीमित कर देना, पूरे सिस्टम की मंशा पर सवाल खड़े करता है।

उमेश्वरपुर धान उपार्जन केंद्र से जुड़े इस प्रकरण में पुलिस चौकी सलका (प्रेमनगर थाना क्षेत्र) में अपराध दर्ज किया गया है। शिकायतकर्ता ओम दत्त दुबे, शाखा प्रबंधक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित, शाखा प्रेमनगर हैं। उनकी लिखित शिकायत के आधार पर सहायक समिति प्रबंधक ठाकुर सिंह मरावी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(5) और 318(4) के तहत एफआईआर पंजीबद्ध की गई है।

प्रकरण की जड़ 9 जनवरी 2026 को किए गए औचक निरीक्षण और भौतिक सत्यापन में है, जब उपायुक्त सहकारिता, उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं और जिला विपणन अधिकारी की संयुक्त टीम ने उमेश्वरपुर केंद्र की जांच की। सत्यापन में रिकॉर्ड के मुकाबले 7,036 क्विंटल धान कम पाया गया, जबकि 17,591 नग वारदाना भी गायब मिला। जांच रिपोर्ट के अनुसार कम धान की कीमत 1 करोड़ 66 लाख 69 हजार 231 रुपये, वारदाने की कीमत 13 लाख 99 हजार 114 रुपये और कुल गबन 1 करोड़ 80 लाख 68 हजार 345 रुपये से अधिक आंका गया।

यहां तक सब कुछ स्पष्ट है, लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। जिला प्रशासन की अपनी अधिकृत जानकारी बताती है कि सावारांवा, टुकुडांड, शिवप्रसादनगर, सूरजपुर, चंदौरा, लटोरी और सलका जैसे कई अन्य धान खरीदी केंद्रों पर भी हजारों बोरियों की कमी पाई गई है। कहीं ढाई हजार क्विंटल से अधिक, तो कहीं छह हजार क्विंटल से ज्यादा धान कम मिला। इसके अलावा सोनपुर और चंदननगर समितियों में भी कमी उजागर होने की चर्चा है। इसके बावजूद इन केंद्रों पर न तो एफआईआर दर्ज हुई, न किसी प्रबंधक या अधिकारी पर कार्रवाई। यह स्थिति साफ तौर पर चयनात्मक और एकपक्षीय कार्रवाई को उजागर करती है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि वे कौन किसान हैं, जिनके नाम पर कागजों में धान बेचा गया, जबकि गोदामों में धान मौजूद ही नहीं था। यदि खरीदी के रिकॉर्ड पूरे हैं और भुगतान भी हुआ है, तो यह धान किसने बेचा और पैसा किसके खाते में गया। क्या वास्तविक किसानों के नाम का दुरुपयोग हुआ, या फिर फर्जी किसानों के नाम पर कागजी खरीदी दिखाकर सरकारी राशि का गबन किया गया। इन “कागजी किसानों” की पहचान किए बिना जांच अधूरी मानी जाएगी।

धान खरीदी व्यवस्था में तहसील कार्यालय, एसडीएम कार्यालय, सहकारिता विभाग, खाद्य विभाग और जिला स्तरीय नोडल अधिकारियों की सीधी जिम्मेदारी तय होती है। नियमों के मुताबिक साप्ताहिक भौतिक सत्यापन अनिवार्य है। अगर यह सत्यापन नियमित और ईमानदारी से हुआ होता, तो हजारों क्विंटल धान महीनों तक गायब कैसे रह सकता था। यह मानना कठिन है कि यह सब बिना अधिकारियों की जानकारी के हुआ हो। इसके बावजूद अब तक किसी भी नोडल अधिकारी, तहसील या एसडीएम स्तर के अफसर पर जवाबदेही तय नहीं की गई, जो प्रशासन की भूमिका को और संदिग्ध बनाती है।

पूरे प्रकरण में मिलरों पर कायम चुप्पी भी कम चौंकाने वाली नहीं है। जिन मिलरों को धान भेजा गया, उनका पूर्व में भौतिक सत्यापन क्यों नहीं किया गया। मिलों में पहुंचा धान, कुटाई और वापसी का मिलान किस स्तर पर हुआ और किसकी निगरानी में हुआ—इन सवालों के जवाब आज भी गायब हैं। मिलरों को जांच के दायरे से बाहर रखना पूरे तंत्र की मिलीभगत की ओर संकेत करता है।

इस घोटाले का सबसे बड़ा नुकसान किसान को हुआ है। किसान सरकार पर भरोसा कर अपनी मेहनत की उपज सौंपता है, लेकिन जब धान कागजों में बिक जाए और गोदाम खाली निकलें, तो यह किसानों के विश्वास के साथ सीधा विश्वासघात है।


इस पूरे मामले पर हमर उत्थान सेवा समिति ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि उमेश्वरपुर में एफआईआर दर्ज होना सही कदम है, लेकिन यह न्याय की शुरुआत भर है। उन्होंने मांग की कि जिन-जिन केंद्रों पर धान और वारदाना की कमी पाई गई है, उन सभी पर समान रूप से एफआईआर दर्ज की जाए। साथ ही कागजों में धान बेचने वाले फर्जी या संदिग्ध किसानों की पहचान सार्वजनिक की जाए। तहसीलदार, एसडीएम, सहकारिता और खाद्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों तथा नोडल अफसरों पर भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाएं और सभी मिलरों का पूर्व एवं वर्तमान भौतिक सत्यापन सार्वजनिक किया जाए। हमर उत्थान सेवा समिति ने आगे कहा कि जब करोड़ों रुपये का धान कागजों में बिक रहा था, तब पूरा प्रशासनिक तंत्र क्या कर रहा था। यदि कार्रवाई अब भी कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रही, तो यह माना जाएगा कि प्रशासन घोटाले से लड़ नहीं रहा, बल्कि उसे ढकने की कोशिश कर रहा है।